Monday, 26 October 2015

दुःख भरे पहाड़ /लालित्य ललित

मेरे दोस्त ने कहा
जब सर दुखता है
तो दर्द होता है
लगता है पहाड़ सर पर बिठा दिया हो किसी ने
देखना तो
अभी बात करते -करते सर फटने लगा
लगता है
फिर से
कसी ने पहाड़ सर पर
बिठा दिया हो।
मैंने कहा दोस्त
जरा हौले से
पहाड़ को सर पर से उतारना
कहीं उसकी वनस्पतियों को
किसी किसिम का
नुक्सान न पहुंचे।

Monday, 17 August 2015

हल्ला

हल्ला /लालित्य ललित


जिसे देखो
जहाँ देखो
वह मचा रहा है
उसको शायद इसमें आनंद आता हो
आता रहे
अपने को क्या
अपने काम में जितना सुख है
वह हल्ले में नहीं
रोल्ले में नहीं
मचाने दो
हल्ला या उससे जुड़ा कोई और प्रसंग
वैसे
एक बात मैं कह दूँ
मुझे शोर -शराबे में भी काम करना आता है
बेशक, आजमा कर देख लो
बस ,हिम्मत हार बैठे
अभी से
आओ तो
मैदान में
अभी तो शुरुआत हुई है
आगे -आगे देखिये
होता है क्या।

Monday, 3 August 2015

वक़्त -वक़्त की बात

वक़्त -वक़्त  की बात /लालित्य ललित


वक़्त 
कई बार ठहर जाता है
अपने किसी
ख़ास हमसफ़र के लिए
मानो
उसने चलना हो
कहीं दूर एक साथ
ऐसे चलने में
आनंद भी है
और
सकून  भी
तुम चलोगी न
मेरे साथ
उसी डगर पर
जहाँ से
हम ने एक साथ
अपनी शुरुआत की थी
आज अपने
इस धर्म को निभाते -निभाते
पूरे  तीस साल बीत गए
ऐसे लगता है
मानो
जैसे यह कल की ही बात हो
हाथों में हाथ
लिए हम आज भी
उन्हीं  सीढ़ियों पर बैठे है
जैसे तुम
फिर से क्लास बंक कर आई हो और
घर जाने की भी जल्दी नहीं
तुम भी न
पगला गई हो
मेरे प्यार में
और हम
फिर से खो गए
जैसे
अभी कुछ देर  में क्लास लगने वाली हो
और
वे पल
जिन्हें हमने फिर से जी लिया
एक बार फिर।

Monday, 27 July 2015

स्त्री कभी नहीं चाहती की

स्त्री कभी नहीं चाहती की /लालित्य ललित

स्त्री कभी नहीं चाहती की
कि उसका पति
उसका प्यार
उससे बेवफाई करे
उसका सम्मान न करे
वह जी नहीं सकती
जीते जी मर जाती है
उसका  भी मन है
उसको समझाती  भी है
पर हर बात की एक सीमा होती है
एक आस होती है
एक उम्मीद होती है
स्त्री कभी नहीं चाहती की
कि  उसका आदमी कम उम्र की औरतों से
कम उम्र के लड़कों से संबंध बनाये
उसको अपमानित करे
 एक गरिमा होती है हर उस औरत की
जो अपने पति के लिए
अपना घर छोड़ कर आई हो
और उसे  देखना पड़े
उफ़
अजीब है हालात
और ये कहानी
आज ऐसी कई जिंदगियों के बीच
कई औरतें जीने को
अपमान का घूंट पीने को मजबूर है
और वह आदमी जो उसका सो काल्ड पति है
उसके बंधने को विवश है
कब अपनी सोच बदलेगी औरत
अब तो आँख खोल
जो हुआ उसे भूल जा
अब सहने का वक्त गया
निर्णय का समय आया।

Friday, 24 July 2015

याद आये तो कर लेना याद

याद आये तो कर लेना याद /लालित्य ललित


याद आये
तो
कर लेना
याद
भूला  मत देना
सच्ची रो पड़ूँगा
पता नहीं
कब से तुम से
यह नेह का नाता जुड़ गया
अपना स्वभाव ही ऐसा है
कब
कौन से डगर में
कौन जुड़ जाए
कौन बिछुड़ जाए
पता ही नहीं चलता

अब देखो न
तुम बिछुड़ गई
समय वजूद सब रहेगा
तुम रहोगी
स्मृति में मेरी
हमेशा के लिए
एक मधुर याद
क्या दिन थे वे
अब ज्यादा याद करूंगा
तो रो पडूंगा
सो
अब और नहीं आज
थोड़ा सा एकांत
जो नितांत मेरा है
अपना है
गर याद आये तो
दूर नहीं मैं
कभी भी
यह कोरा  आश्वाशन नहीं
सच है
दिल से कहा है
और मैं कभी झूठ नहीं कहता।

Friday, 17 July 2015

पता सब है

पता सब है /लालित्य ललित

कई बार
कुछ चीजों को
भूल जाने का मन करता है
लेकिन मन है
इतनी  आसानी से कहाँ मानता है
और वे
सोचते है कि
यह हमारी जीत है
हमने जो सोचा
शायद हमारा निर्णय ठीक था
मैं कई चीजों पर
हँस  देता हूँ
सोचता हूँ  शायद यही लिखा था
होने दो 
यह मेरी मूर्खता है
या
उनकी चाल
कुछ चीजें  हालात पर छोड़ देता हूँ
यह भी  वक्त है
एक वह भी ज़माना था
हर पल का
अपना आनंद होता है
इसको भी एक आनंद मान लिया
और शांत होकर
कुछ देर को
आँख मूँद ली।
[17 जुलाई 2015 ]

Thursday, 16 July 2015

जिंदगी को समझने का मेरा फ़लसफ़ा

जिंदगी को समझने का मेरा फ़लसफ़ा /लालित्य ललित


जिंदगी बहुत तेज़ी  से
अपने साथ बहा ले जाती है
किस्से ,कहानियाँ अपनापन और तमाम तरह की
मेहरबानियाँ भी
लेकिन  एक बात जो मैंने समझी
तुम्हारे साथ
तुम किसी भी हाल में
नहीं बदली
तो नहीं बदली
शायद जिंदगी को समझने का यह तुम्हारा फ़लसफ़ा  था
पर मुझ से
बेहद मेच  करता है
शायद यही अपने जीवन को समझने का
 समन्वय है
सेतु है
और सच भी
जो शायद नहीं बदलेगा
होना भी यही चाहिए
अब तो मैं भी यही चाहता हूँ कि  तुम्हारे साथ ही बिताऊं
अपने सब दुःख और सुख
साँझा करूँ  वे पल
जो नितांत अपने है ,अपने थे  रहेंगे
यह सौ फीसदी सच है
साथ दोगी मेरा
मीलों  दूर चलने का
नाराज तो नहीं होगी
नहीं -
यह तुमने कहा
और कहा -आजमा कर देख लो
मैंने कहा -
अब क्या आजमाना
जब कह दिया तो कह दिया
बार -बार एक  अपन दोहराते नहीं
गाडी हाइवे पर  दौड़ने लगी थीं
और तुमने अपना सर मेरे कंधे पर झूला दिया था
शायद यह ठंडी हवा का असर था
या अपना प्यार फिर से
रिचार्ज  था
अब जो भी था
वह अनुपम और लावण्ययुक्त था
जिसको  परिभाषित नहीं  सकता
न आज
न कभी भी।