स्त्री कभी नहीं चाहती की /लालित्य ललित
स्त्री कभी नहीं चाहती की
कि उसका पति
उसका प्यार
उससे बेवफाई करे
उसका सम्मान न करे
वह जी नहीं सकती
जीते जी मर जाती है
उसका भी मन है
उसको समझाती भी है
पर हर बात की एक सीमा होती है
एक आस होती है
एक उम्मीद होती है
स्त्री कभी नहीं चाहती की
कि उसका आदमी कम उम्र की औरतों से
कम उम्र के लड़कों से संबंध बनाये
उसको अपमानित करे
एक गरिमा होती है हर उस औरत की
जो अपने पति के लिए
अपना घर छोड़ कर आई हो
और उसे देखना पड़े
उफ़
अजीब है हालात
और ये कहानी
आज ऐसी कई जिंदगियों के बीच
कई औरतें जीने को
अपमान का घूंट पीने को मजबूर है
और वह आदमी जो उसका सो काल्ड पति है
उसके बंधने को विवश है
कब अपनी सोच बदलेगी औरत
अब तो आँख खोल
जो हुआ उसे भूल जा
अब सहने का वक्त गया
निर्णय का समय आया।
स्त्री कभी नहीं चाहती की
कि उसका पति
उसका प्यार
उससे बेवफाई करे
उसका सम्मान न करे
वह जी नहीं सकती
जीते जी मर जाती है
उसका भी मन है
उसको समझाती भी है
पर हर बात की एक सीमा होती है
एक आस होती है
एक उम्मीद होती है
स्त्री कभी नहीं चाहती की
कि उसका आदमी कम उम्र की औरतों से
कम उम्र के लड़कों से संबंध बनाये
उसको अपमानित करे
एक गरिमा होती है हर उस औरत की
जो अपने पति के लिए
अपना घर छोड़ कर आई हो
और उसे देखना पड़े
उफ़
अजीब है हालात
और ये कहानी
आज ऐसी कई जिंदगियों के बीच
कई औरतें जीने को
अपमान का घूंट पीने को मजबूर है
और वह आदमी जो उसका सो काल्ड पति है
उसके बंधने को विवश है
कब अपनी सोच बदलेगी औरत
अब तो आँख खोल
जो हुआ उसे भूल जा
अब सहने का वक्त गया
निर्णय का समय आया।
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