Thursday, 16 July 2015

सारी बात नहीं मानते

सारी बात नहीं मानते /लालित्य ललित

अगर सारी बात मान लेता तो
यह नौबत ही नहीं आती
एक बात
आज क्लीयर  कर दूँ
अगर
साथ चलना हो तो
बात बात में
बहाने बनाना ठीक नहीं
मौसम सुहाना है
चलने का मन हो तो कहो
एक बार
फिर लॉन्ग ड्राइव हो जाए
फिर से
इस बारिश में
अपने उन  दिनों में लौट जाए
पता नहीं क्यों तुम पर
लाख चाहते हुए भी नाराज नहीं हो पाता
बारिश की बूंदें
तेजी से एक बार फिर
चेहरे पर पड़ने लगी थीं
हमारा प्यार
एक बार फिर से उन दिनों में लौट गया
सारी बार मानी होती
बारिश का मजा भी नहीं ले पाते। 
शायद यह प्रेम है या प्रेम की नई परिभाषा
आज के सन्दर्भ में। 

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