Monday, 17 August 2015

हल्ला

हल्ला /लालित्य ललित


जिसे देखो
जहाँ देखो
वह मचा रहा है
उसको शायद इसमें आनंद आता हो
आता रहे
अपने को क्या
अपने काम में जितना सुख है
वह हल्ले में नहीं
रोल्ले में नहीं
मचाने दो
हल्ला या उससे जुड़ा कोई और प्रसंग
वैसे
एक बात मैं कह दूँ
मुझे शोर -शराबे में भी काम करना आता है
बेशक, आजमा कर देख लो
बस ,हिम्मत हार बैठे
अभी से
आओ तो
मैदान में
अभी तो शुरुआत हुई है
आगे -आगे देखिये
होता है क्या।

Monday, 3 August 2015

वक़्त -वक़्त की बात

वक़्त -वक़्त  की बात /लालित्य ललित


वक़्त 
कई बार ठहर जाता है
अपने किसी
ख़ास हमसफ़र के लिए
मानो
उसने चलना हो
कहीं दूर एक साथ
ऐसे चलने में
आनंद भी है
और
सकून  भी
तुम चलोगी न
मेरे साथ
उसी डगर पर
जहाँ से
हम ने एक साथ
अपनी शुरुआत की थी
आज अपने
इस धर्म को निभाते -निभाते
पूरे  तीस साल बीत गए
ऐसे लगता है
मानो
जैसे यह कल की ही बात हो
हाथों में हाथ
लिए हम आज भी
उन्हीं  सीढ़ियों पर बैठे है
जैसे तुम
फिर से क्लास बंक कर आई हो और
घर जाने की भी जल्दी नहीं
तुम भी न
पगला गई हो
मेरे प्यार में
और हम
फिर से खो गए
जैसे
अभी कुछ देर  में क्लास लगने वाली हो
और
वे पल
जिन्हें हमने फिर से जी लिया
एक बार फिर।