Monday, 17 August 2015

हल्ला

हल्ला /लालित्य ललित


जिसे देखो
जहाँ देखो
वह मचा रहा है
उसको शायद इसमें आनंद आता हो
आता रहे
अपने को क्या
अपने काम में जितना सुख है
वह हल्ले में नहीं
रोल्ले में नहीं
मचाने दो
हल्ला या उससे जुड़ा कोई और प्रसंग
वैसे
एक बात मैं कह दूँ
मुझे शोर -शराबे में भी काम करना आता है
बेशक, आजमा कर देख लो
बस ,हिम्मत हार बैठे
अभी से
आओ तो
मैदान में
अभी तो शुरुआत हुई है
आगे -आगे देखिये
होता है क्या।

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