Monday, 27 July 2015

स्त्री कभी नहीं चाहती की

स्त्री कभी नहीं चाहती की /लालित्य ललित

स्त्री कभी नहीं चाहती की
कि उसका पति
उसका प्यार
उससे बेवफाई करे
उसका सम्मान न करे
वह जी नहीं सकती
जीते जी मर जाती है
उसका  भी मन है
उसको समझाती  भी है
पर हर बात की एक सीमा होती है
एक आस होती है
एक उम्मीद होती है
स्त्री कभी नहीं चाहती की
कि  उसका आदमी कम उम्र की औरतों से
कम उम्र के लड़कों से संबंध बनाये
उसको अपमानित करे
 एक गरिमा होती है हर उस औरत की
जो अपने पति के लिए
अपना घर छोड़ कर आई हो
और उसे  देखना पड़े
उफ़
अजीब है हालात
और ये कहानी
आज ऐसी कई जिंदगियों के बीच
कई औरतें जीने को
अपमान का घूंट पीने को मजबूर है
और वह आदमी जो उसका सो काल्ड पति है
उसके बंधने को विवश है
कब अपनी सोच बदलेगी औरत
अब तो आँख खोल
जो हुआ उसे भूल जा
अब सहने का वक्त गया
निर्णय का समय आया।

Friday, 24 July 2015

याद आये तो कर लेना याद

याद आये तो कर लेना याद /लालित्य ललित


याद आये
तो
कर लेना
याद
भूला  मत देना
सच्ची रो पड़ूँगा
पता नहीं
कब से तुम से
यह नेह का नाता जुड़ गया
अपना स्वभाव ही ऐसा है
कब
कौन से डगर में
कौन जुड़ जाए
कौन बिछुड़ जाए
पता ही नहीं चलता

अब देखो न
तुम बिछुड़ गई
समय वजूद सब रहेगा
तुम रहोगी
स्मृति में मेरी
हमेशा के लिए
एक मधुर याद
क्या दिन थे वे
अब ज्यादा याद करूंगा
तो रो पडूंगा
सो
अब और नहीं आज
थोड़ा सा एकांत
जो नितांत मेरा है
अपना है
गर याद आये तो
दूर नहीं मैं
कभी भी
यह कोरा  आश्वाशन नहीं
सच है
दिल से कहा है
और मैं कभी झूठ नहीं कहता।

Friday, 17 July 2015

पता सब है

पता सब है /लालित्य ललित

कई बार
कुछ चीजों को
भूल जाने का मन करता है
लेकिन मन है
इतनी  आसानी से कहाँ मानता है
और वे
सोचते है कि
यह हमारी जीत है
हमने जो सोचा
शायद हमारा निर्णय ठीक था
मैं कई चीजों पर
हँस  देता हूँ
सोचता हूँ  शायद यही लिखा था
होने दो 
यह मेरी मूर्खता है
या
उनकी चाल
कुछ चीजें  हालात पर छोड़ देता हूँ
यह भी  वक्त है
एक वह भी ज़माना था
हर पल का
अपना आनंद होता है
इसको भी एक आनंद मान लिया
और शांत होकर
कुछ देर को
आँख मूँद ली।
[17 जुलाई 2015 ]

Thursday, 16 July 2015

जिंदगी को समझने का मेरा फ़लसफ़ा

जिंदगी को समझने का मेरा फ़लसफ़ा /लालित्य ललित


जिंदगी बहुत तेज़ी  से
अपने साथ बहा ले जाती है
किस्से ,कहानियाँ अपनापन और तमाम तरह की
मेहरबानियाँ भी
लेकिन  एक बात जो मैंने समझी
तुम्हारे साथ
तुम किसी भी हाल में
नहीं बदली
तो नहीं बदली
शायद जिंदगी को समझने का यह तुम्हारा फ़लसफ़ा  था
पर मुझ से
बेहद मेच  करता है
शायद यही अपने जीवन को समझने का
 समन्वय है
सेतु है
और सच भी
जो शायद नहीं बदलेगा
होना भी यही चाहिए
अब तो मैं भी यही चाहता हूँ कि  तुम्हारे साथ ही बिताऊं
अपने सब दुःख और सुख
साँझा करूँ  वे पल
जो नितांत अपने है ,अपने थे  रहेंगे
यह सौ फीसदी सच है
साथ दोगी मेरा
मीलों  दूर चलने का
नाराज तो नहीं होगी
नहीं -
यह तुमने कहा
और कहा -आजमा कर देख लो
मैंने कहा -
अब क्या आजमाना
जब कह दिया तो कह दिया
बार -बार एक  अपन दोहराते नहीं
गाडी हाइवे पर  दौड़ने लगी थीं
और तुमने अपना सर मेरे कंधे पर झूला दिया था
शायद यह ठंडी हवा का असर था
या अपना प्यार फिर से
रिचार्ज  था
अब जो भी था
वह अनुपम और लावण्ययुक्त था
जिसको  परिभाषित नहीं  सकता
न आज
न कभी भी।

सारी बात नहीं मानते

सारी बात नहीं मानते /लालित्य ललित

अगर सारी बात मान लेता तो
यह नौबत ही नहीं आती
एक बात
आज क्लीयर  कर दूँ
अगर
साथ चलना हो तो
बात बात में
बहाने बनाना ठीक नहीं
मौसम सुहाना है
चलने का मन हो तो कहो
एक बार
फिर लॉन्ग ड्राइव हो जाए
फिर से
इस बारिश में
अपने उन  दिनों में लौट जाए
पता नहीं क्यों तुम पर
लाख चाहते हुए भी नाराज नहीं हो पाता
बारिश की बूंदें
तेजी से एक बार फिर
चेहरे पर पड़ने लगी थीं
हमारा प्यार
एक बार फिर से उन दिनों में लौट गया
सारी बार मानी होती
बारिश का मजा भी नहीं ले पाते। 
शायद यह प्रेम है या प्रेम की नई परिभाषा
आज के सन्दर्भ में। 

मिलना

मिलना /लालित्य ललित


तुम से मिलना
हर बार अच्छा लगता है
क्या तुम्हें भी
ऐसी ही फीलिंग होती है
यदि होती है तो
पागल तुम्हें भी प्रेम  हो गया है
मेरी तरह।